10 साल की बेटी हर बात मुंह पर बोल देती है, माता-पिता परेशान: साफगोई है या संवेदनहीनता? जानिए एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं और कैसे दें सही परवरिश

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आजकल कई माता-पिता एक ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं, जहां उनका बच्चा बहुत खुलकर अपनी बात कहता है, लेकिन कई बार यह साफगोई दूसरों को आहत कर देती है। खासकर 8 से 12 साल की उम्र के बच्चों में यह व्यवहार ज्यादा देखने को मिलता है। ऐसे ही एक सवाल में एक माता-पिता ने चिंता जताई कि उनकी 10 साल की बेटी “जो मन में आता है, बोल देती है।” ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि यह व्यवहार स्वाभाविक है या फिर बच्चे में संवेदनाओं की कमी का संकेत।

बेबाकी का दौर: बचपन का स्वाभाविक विकास

विशेषज्ञों के अनुसार, 10 साल की उम्र में बच्चे अपनी सोच और भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना सीखते हैं। इस उम्र में वे सही-गलत को समझने की प्रक्रिया में होते हैं, लेकिन शब्दों का चयन और सामाजिक व्यवहार पूरी तरह विकसित नहीं होता। इसलिए वे कई बार बिना सोचे-समझे ऐसी बातें कह देते हैं, जो दूसरों को गलत या कठोर लग सकती हैं। इसे तुरंत “संवेदनहीनता” मान लेना सही नहीं है, बल्कि यह उनके मानसिक और भावनात्मक विकास का हिस्सा हो सकता है।

साफगोई और संवेदनशीलता में फर्क समझाना जरूरी

बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि सच बोलना अच्छी बात है, लेकिन उसे कैसे और कब कहा जाए, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर बच्चा किसी की कमी या गलती को सीधे कह देता है, तो उसे यह समझाना चाहिए कि वही बात थोड़े नरम और सम्मानजनक तरीके से भी कही जा सकती है। उदाहरण के तौर पर, “तुम मोटे हो” कहने के बजाय “तुम्हें फिट रहने की कोशिश करनी चाहिए” कहना बेहतर होता है। इस तरह बच्चों को शब्दों की ताकत और उनके असर के बारे में धीरे-धीरे सिखाया जा सकता है।

डांट नहीं, संवाद है सबसे बड़ा समाधान

ऐसे मामलों में माता-पिता का व्यवहार बेहद अहम होता है। अगर बच्चे को हर बार डांट दिया जाए या चुप करा दिया जाए, तो वह अपनी बात कहना बंद कर सकता है या फिर और ज्यादा जिद्दी हो सकता है। बेहतर तरीका यह है कि उससे शांतिपूर्वक बात की जाए और समझाया जाए कि उसकी बात से सामने वाले को कैसा महसूस हुआ। इससे बच्चे में सहानुभूति (एम्पैथी) विकसित होती है।

रोल मॉडल बनकर सिखाएं व्यवहार

बच्चे अपने आसपास के लोगों से बहुत कुछ सीखते हैं। अगर घर में बड़े लोग एक-दूसरे से सम्मानजनक भाषा में बात करते हैं, तो बच्चा भी वही अपनाता है। इसलिए माता-पिता को खुद अपने व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। अगर आप दूसरों के प्रति संवेदनशील और समझदारी से पेश आते हैं, तो बच्चा भी धीरे-धीरे वही सीखता है।

एम्पैथी सिखाने के छोटे-छोटे तरीके

बच्चों में संवेदनशीलता विकसित करने के लिए उन्हें छोटे-छोटे उदाहरण दिए जा सकते हैं। जैसे—अगर किसी दोस्त को चोट लगती है, तो उससे पूछना कि “अगर तुम्हें चोट लगती तो कैसा लगता?” इस तरह के सवाल बच्चे को दूसरों की भावनाओं को समझने में मदद करते हैं। कहानियों, खेल और रोजमर्रा की घटनाओं के जरिए भी यह सीख दी जा सकती है।

हर बेबाक बच्चा गलत नहीं होता

यह समझना जरूरी है कि हर खुलकर बोलने वाला बच्चा गलत नहीं होता। कई बार यही गुण आगे चलकर आत्मविश्वास और मजबूत व्यक्तित्व की पहचान बनता है। जरूरत सिर्फ इस बात की होती है कि इस बेबाकी को सही दिशा दी जाए, ताकि बच्चा अपनी बात भी रख सके और दूसरों की भावनाओं का सम्मान भी कर सके।

कब सतर्क होने की जरूरत है

हालांकि, अगर बच्चा बार-बार दूसरों को जानबूझकर आहत कर रहा है, उनकी भावनाओं की परवाह नहीं करता या अपने व्यवहार को सुधारने की कोशिश नहीं करता, तो यह संकेत हो सकता है कि उसे अतिरिक्त मार्गदर्शन की जरूरत है। ऐसे में किसी काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद लेना फायदेमंद हो सकता है।

कुल मिलाकर, 10 साल की उम्र में बच्चों का मुंहफट होना असामान्य नहीं है, लेकिन यह माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे उसे संवेदनशीलता, सम्मान और सही संवाद का तरीका सिखाएं। सही मार्गदर्शन से यही बेबाकी बच्चे की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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