कमजोर होते हुए भी पीछे नहीं हट रहा ईरान: लंबी जंग की रणनीति से दुश्मनों को झुकाने की कोशिश, मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव

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मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच ईरान ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है, जिसने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। भारी नुकसान, नेतृत्व में गिरावट और आंतरिक दबाव के बावजूद ईरान ने सरेंडर से इनकार करते हुए युद्ध को लंबा खींचने का रास्ता चुना है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की रणनीति पारंपरिक जीत हासिल करना नहीं, बल्कि संघर्ष को इतना महंगा बनाना है कि अमेरिका और इजराइल जैसे देश समझौते के लिए मजबूर हो जाएं।

भारी नुकसान के बावजूद आक्रामक रुख

पिछले कुछ हफ्तों में ईरान को सैन्य और नेतृत्व स्तर पर बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। कई शीर्ष कमांडर और अहम अधिकारी मारे गए हैं, जिससे उसकी कमांड संरचना कमजोर हुई है। इसके बावजूद ईरान की बची हुई लीडरशिप लगातार आक्रामक बयान दे रही है और यह संकेत दे रही है कि वह लंबे समय तक संघर्ष झेलने के लिए तैयार है। देश के अंदर भी हालात चुनौतीपूर्ण हैं, जहां लोगों को जरूरी सामान की कमी, बुनियादी ढांचे के नुकसान और कड़े सुरक्षा माहौल का सामना करना पड़ रहा है।

जंग को महंगा बनाकर दबाव की रणनीति

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान की मौजूदा रणनीति “लंबे युद्ध” की है, जिसमें वह सीधे जीत के बजाय दुश्मनों पर आर्थिक और रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। ईरान चाहता है कि युद्ध इतना महंगा और जटिल हो जाए कि अमेरिका और उसके सहयोगी इसे जारी रखने में असमर्थ हो जाएं। खासतौर पर तेल सप्लाई और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर डालकर ईरान दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य इस रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल सप्लाई होता है। यहां जहाजों पर हमले और रुकावटों ने वैश्विक बाजार को प्रभावित किया है।

युद्ध के बाद की शर्तें तय करना चाहता है ईरान

ईरान केवल युद्ध जारी रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह युद्ध के बाद की स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ना चाहता है। ईरान के नेताओं ने साफ किया है कि वे किसी भी युद्धविराम के लिए तब ही तैयार होंगे, जब उन्हें यह भरोसा होगा कि दुश्मन दोबारा हमला नहीं करेगा। इसके अलावा ईरान युद्ध के नुकसान की भरपाई यानी मुआवजे की भी मांग कर रहा है और क्षेत्र में नई सुरक्षा व्यवस्था बनाने की बात कर रहा है।

ईरानी संसद अध्यक्ष ने कहा है कि ऐसा युद्धविराम स्वीकार्य नहीं होगा, जिससे दुश्मनों को अपनी सैन्य ताकत दोबारा मजबूत करने का मौका मिले। यह बयान ईरान की सख्त रणनीति को दर्शाता है।

विदेश नीति और समुद्री नियंत्रण पर नजर

ईरान के विदेश मंत्री ने संकेत दिए हैं कि युद्ध के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन के लिए नए नियम बनाए जा सकते हैं, जिसमें ईरान के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान भविष्य में इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर नियंत्रण या टैक्स लगाने जैसे कदम भी उठा सकता है।

दबाव को अवसर में बदलने की कोशिश

मिडिल ईस्ट मामलों की विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान मौजूदा संकट को अपने दीर्घकालिक फायदे में बदलना चाहता है। वह ऐसी स्थिति बनाना चाहता है, जहां उसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अनिवार्य शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाए, न कि अलग-थलग करने की कोशिश की जाए।

ईरान ने इस तरह की स्थिति के लिए पहले से तैयारी भी की थी। उसकी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने छोटे-छोटे यूनिट्स के जरिए हमले करने की रणनीति विकसित की थी, जिससे बड़े नुकसान के बावजूद उसकी सैन्य गतिविधियां जारी रह सकें।

नई नेतृत्व पीढ़ी और बदली रणनीति

हाल के हमलों में पुराने नेताओं के मारे जाने के बाद ईरान में एक नई पीढ़ी के कमांडर सामने आए हैं, जो अलग सोच के साथ फैसले ले रहे हैं। उन्होंने इराक और सीरिया में ईरान की सैन्य रणनीतियों को करीब से देखा है और उसी आधार पर अब निर्णय ले रहे हैं।

खाड़ी देशों का झुकाव बदल सकता है

हालांकि ईरान की यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। खाड़ी देशों जैसे UAE, सऊदी अरब और कतर ने अब तक सीधे युद्ध में हिस्सा नहीं लिया है, लेकिन वे लगातार हमलों से प्रभावित हुए हैं। ऐसे में कई देशों ने संकेत दिए हैं कि वे अमेरिका और इजराइल के साथ अपने संबंध और मजबूत कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की आक्रामक रणनीति उल्टा असर भी डाल सकती है, जिससे क्षेत्र में उसके खिलाफ गठबंधन और मजबूत हो सकता है।

कुल मिलाकर, ईरान की रणनीति पारंपरिक युद्ध से अलग है, जहां वह जीत के बजाय संघर्ष को लंबा खींचकर और महंगा बनाकर अपने विरोधियों को थकाने और झुकाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में यह रणनीति मिडिल ईस्ट और वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर सकती है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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