देश में गैस संकट गहराया: 20% परिवार ब्लैक में खरीद रहे सिलेंडर, 68% घरों तक समय पर नहीं पहुंच रही सप्लाई

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देशभर में रसोई गैस की किल्लत अब गंभीर रूप लेती जा रही है। ताजा सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिनसे साफ है कि आम लोगों को रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। रिसर्च संस्था LocalCircles की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 20% परिवारों को मजबूरी में गैस सिलेंडर ब्लैक में खरीदना पड़ रहा है, जिसके लिए उन्हें तय कीमत से कई गुना ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि गैस की कमी और डिलीवरी में देरी के चलते स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। पिछले हफ्ते के मुकाबले ब्लैक में सिलेंडर खरीदने वालों की संख्या 14% से बढ़कर 20% तक पहुंच गई है। वहीं, 68% परिवारों को समय पर गैस डिलीवरी नहीं मिल पा रही है, जो पहले 57% थी।

₹300 से ₹4,000 तक ज्यादा देने को मजबूर उपभोक्ता

सर्वे के अनुसार, गैस की भारी किल्लत के चलते उपभोक्ताओं को एक घरेलू सिलेंडर के लिए ₹300 से लेकर ₹4,000 तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ रहा है। कई मामलों में यह राशि और भी ज्यादा देखी गई है। एक उदाहरण में, एक हाउसिंग सोसाइटी को सामुदायिक कार्यक्रम के लिए एक सिलेंडर के ₹5,000 तक देने पड़े।

यह स्थिति इस बात का संकेत है कि बाजार में गैस की उपलब्धता बेहद सीमित हो गई है और कालाबाजारी करने वाले इसका फायदा उठा रहे हैं। आम आदमी, जो पहले ही महंगाई से जूझ रहा है, अब रसोई चलाने के लिए भी भारी कीमत चुका रहा है।

‘फैंटम डिलीवरी’ से बढ़ी परेशानी, भरोसा हुआ कमजोर

गैस वितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए लागू किए गए डिजिटल सिस्टम का भी दुरुपयोग सामने आया है। करीब 12% उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि उन्हें सिलेंडर डिलीवर होने का मैसेज मिल जाता है, जबकि वास्तव में उन्हें गैस नहीं मिलती।

इस तरह की ‘फैंटम डिलीवरी’ ने उपभोक्ताओं का भरोसा तोड़ा है। लोग अब आधिकारिक बुकिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी संदेह करने लगे हैं, जिससे व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सिर्फ 28% परिवारों को समय पर मिल रही गैस

देश के 328 जिलों में 57,000 लोगों पर किए गए सर्वे में सामने आया कि केवल 28% परिवारों को ही समय पर गैस सिलेंडर मिल पा रहा है। बाकी अधिकांश लोग या तो इंतजार कर रहे हैं या फिर वैकल्पिक उपायों की तलाश में हैं।

सर्वे में शामिल 61% पुरुष और 39% महिलाओं ने गैस सप्लाई में देरी और परेशानी की पुष्टि की। यह आंकड़ा दर्शाता है कि यह समस्या पूरे देश में व्यापक स्तर पर फैल चुकी है और शहरी व ग्रामीण दोनों क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है।

शहरों में PNG की ओर रुझान, गांवों में फिर लकड़ी का सहारा

गैस संकट के चलते शहरी क्षेत्रों में लोग अब पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की ओर रुख कर रहे हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में हालात और खराब हैं। सप्लाई बाधित होने के कारण 40% से ज्यादा लोग फिर से पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी और उपलों का उपयोग करने लगे हैं।

यह स्थिति सरकार की स्वच्छ ईंधन योजना के लिए भी चुनौती बन रही है, क्योंकि जिन परिवारों को गैस से जोड़ने का लक्ष्य था, वे अब मजबूरी में पुराने तरीकों पर लौट रहे हैं।

वैश्विक संकट का असर: युद्ध और सप्लाई चेन प्रभावित

इस गैस संकट के पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी बड़ी वजह मानी जा रही हैं। ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।

खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के लगभग बंद होने से भारत सहित कई देशों को कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति में बाधा आई है। यह मार्ग दुनिया के करीब 20% पेट्रोलियम परिवहन के लिए अहम माना जाता है।

इसके अलावा कतर के रास लफ्फान एलएनजी प्लांट के बंद होने से भी वैश्विक गैस सप्लाई पर असर पड़ा है, जिससे कीमतों में तेजी आई है।

सरकार की कार्रवाई और आगे की चुनौती

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने हालात को नियंत्रित करने के लिए देशभर में 4500 से ज्यादा छापेमारी की है और निगरानी बढ़ाई है। साथ ही, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा 1800 से अधिक निरीक्षण भी किए गए हैं।

सरकार का कहना है कि पैनिक बुकिंग में कमी आई है और स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में लाई जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों की परेशानियां अभी भी बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सप्लाई चेन सामान्य नहीं होती और कालाबाजारी पर सख्ती नहीं होती, तब तक आम उपभोक्ताओं को राहत मिलना मुश्किल है। ऐसे में सरकार और एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे पारदर्शिता और उपलब्धता दोनों को सुनिश्चित करें, ताकि लोगों को जरूरी ईंधन के लिए ब्लैक मार्केट का सहारा न लेना पड़े।

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Author: THE CG NEWS

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