
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर बड़ी गिरावट देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत घटकर करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है, जो ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से पहले के स्तर के बराबर मानी जा रही है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में आई इस नरमी से भारत जैसे तेल आयातक देशों को राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने का फायदा आम उपभोक्ताओं को तुरंत नहीं मिलेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने में अभी करीब ढाई महीने का समय लग सकता है।
ईरान तनाव कम होने से गिरे कच्चे तेल के दाम
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा तेल आपूर्ति को लेकर बने सकारात्मक माहौल के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि ईरानी तेल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील मिलने और वैश्विक आपूर्ति सामान्य होने से बाजार में स्थिरता लौट रही है।
इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही भी बढ़ने लगी है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। जहाजों की आवाजाही सामान्य होने से वैश्विक सप्लाई चेन में सुधार आया है, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता क्यों नहीं होगा?
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत कम नहीं होंगे। ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा के अनुसार, फिलहाल देश में जिन पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री हो रही है, उन्हें तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया गया कच्चा तेल उस समय खरीदा गया था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह लागत परिवहन और अन्य खर्चों को मिलाकर और अधिक रही।
ऐसे में मौजूदा समय में 72 डॉलर प्रति बैरल की दर से खरीदे गए कच्चे तेल का प्रभाव खुदरा बाजार तक पहुंचने में समय लगेगा। इसलिए उपभोक्ताओं को तुरंत कीमतों में कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
75 से 80 दिन का होता है पूरा चक्र
विशेषज्ञों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदे गए कच्चे तेल को तेल उत्पादक देशों के बंदरगाहों से जहाजों में लोड होने में लगभग 15 से 20 दिन लगते हैं। इसके बाद भारत के बंदरगाहों तक पहुंचने में करीब 55 से 60 दिन का समय लगता है।
भारत पहुंचने के बाद कच्चे तेल को रिफाइनरियों में भेजा जाता है, जहां इसे पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों में परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद तैयार उत्पाद देशभर के डिपो और पेट्रोल पंपों तक पहुंचते हैं। पूरी प्रक्रिया में लगभग 75 से 80 दिन का समय लगता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का असर खुदरा बाजार में देर से दिखाई देता है।
पहले घाटे की भरपाई कर सकती हैं कंपनियां
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल विपणन कंपनियां पहले अपने वित्तीय नुकसान की भरपाई करने की कोशिश करेंगी। बताया जा रहा है कि मौजूदा समय में कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर प्रति लीटर लगभग 7 से 8 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा सरकार द्वारा पहले घटाई गई एक्साइज ड्यूटी का असर भी कंपनियों की आय पर पड़ा है।
ऐसी स्थिति में कंपनियां कुछ समय तक सस्ते कच्चे तेल का लाभ अपने घाटे को कम करने में इस्तेमाल कर सकती हैं। इसके बाद ही उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी।
दशहरे तक मिल सकती है राहत
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का अनुमान है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं, तो अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत से राहत के संकेत मिल सकते हैं। वहीं, खुदरा स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में स्पष्ट कमी दशहरे के आसपास देखने को मिल सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि फिलहाल वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में फिर से बड़ी तेजी आने की संभावना कम दिखाई दे रही है। यदि किसी बड़े भू–राजनीतिक संकट की स्थिति नहीं बनती है तो आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है। ऐसे में भारत में भी ईंधन की कीमतों में धीरे–धीरे राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।
Author: THE CG NEWS
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