
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण से सम्मानित महान पंडवानी गायिका तीजन बाई सोमवार को पंचतत्व में विलीन हो गईं। उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में कलाकार, साहित्यकार, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और हजारों प्रशंसक शामिल हुए। मुक्तिधाम में उन्हें अंतिम विदाई देते समय लोगों ने भावुक होकर छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध लोकगीत “चोला माटी के हे राम” गाया, जिससे पूरा वातावरण गमगीन हो गया। उनके निधन को छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोक कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
लोककला की ऐसी साधिका, जिसने पंडवानी को विश्वभर में पहुंचाया
तीजन बाई ने अपने जीवन का हर पल पंडवानी कला को समर्पित किया। महाभारत की कथाओं को अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनोखी प्रस्तुति शैली के माध्यम से उन्होंने देश-विदेश के लाखों दर्शकों तक पहुंचाया। उस दौर में जब पंडवानी गायन पर पुरुष कलाकारों का वर्चस्व माना जाता था, तब तीजन बाई ने सभी सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका सहित अनेक देशों में अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय लोक संस्कृति का गौरव बढ़ाया और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया।
नाना से मिली प्रेरणा, 13 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ सफर
तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में दुर्ग जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अपने नाना से महाभारत और पंडवानी की कहानियां सुनने का अवसर मिला। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी का गायन किया और अपनी असाधारण प्रतिभा से लोगों का ध्यान आकर्षित किया। शुरुआती दिनों में उन्हें सामाजिक विरोध और आर्थिक कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनकी मेहनत और समर्पण ने उन्हें देश के सर्वोच्च लोक कलाकारों की श्रेणी में पहुंचा दिया।
10 रुपये के पहले इनाम से पद्म विभूषण तक का सफर
तीजन बाई के संघर्ष की कहानी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। अपने शुरुआती दिनों में उन्हें पहली प्रस्तुति के लिए मात्र 10 रुपये का पुरस्कार मिला था। यही छोटी-सी उपलब्धि उनके लिए आगे बढ़ने का संबल बनी। वर्षों की कठिन साधना के बाद उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और अंततः देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेश से भेजे गए पत्र भी बिना पूरे पते के केवल उनके नाम पर उनके घर तक पहुंच जाते थे।
अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, नेताओं और कलाकारों ने दी श्रद्धांजलि
तीजन बाई के निधन की खबर मिलते ही पूरे छत्तीसगढ़ में शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री सहित कई वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों, कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्यमंत्री उनके निधन की सूचना मिलते ही अस्पताल पहुंचे और इसे राज्य की सांस्कृतिक धरोहर की अपूरणीय क्षति बताया। अंतिम संस्कार के दौरान राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम सलामी दी गई। हजारों लोगों ने नम आंखों से अपनी प्रिय लोक कलाकार को अंतिम विदाई दी।
हमेशा जीवित रहेगी तीजन बाई की विरासत
तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनकी शैली और पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का उनका योगदान हमेशा अमर रहेगा। उन्होंने यह साबित किया कि लोककला केवल परंपरा नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक आत्मा होती है। आने वाली पीढ़ियां उनकी प्रस्तुतियों से प्रेरणा लेती रहेंगी और पंडवानी की परंपरा को आगे बढ़ाती रहेंगी। भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में तीजन बाई का नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। उनके निधन से जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भर पाना संभव नहीं है, लेकिन उनकी कला आने वाले वर्षों तक देश–दुनिया में छत्तीसगढ़ की पहचान बनकर गूंजती रहेगी।
Author: THE CG NEWS
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