14 साल में सबसे कम खुदरा महंगाई दर: अक्टूबर में CPI घटकर 0.25% पर, खाने-पीने की चीजों में आई भारी गिरावट का असर

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भारत में खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) अक्टूबर 2025 में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर महीने में खुदरा महंगाई घटकर मात्र 0.25% रह गई है। यह वर्तमान CPI सीरीज की अब तक की सबसे कम सालाना दर है और लगभग 14 वर्षों में सबसे निचला स्तर है। सितंबर 2025 में खुदरा महंगाई 1.44% दर्ज की गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में गिरावट का सीधा असर इस रिकॉर्ड गिरावट पर पड़ा है।

खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में आई नरमी

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर महीने में खाद्य महंगाई दर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। खाने-पीने की वस्तुएं, जो CPI बास्केट में लगभग 50% हिस्सेदारी रखती हैं, उनकी महीने-दर-महीने महंगाई दर माइनस 2.28% से घटकर माइनस 5.02% पर पहुंच गई है। इसका मतलब यह हुआ कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में औसतन गिरावट आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई दर में कमी देखी गई है। ग्रामीण इलाकों में खुदरा महंगाई सितंबर के 1.07% से घटकर अक्टूबर में माइनस 0.25% पर आ गई। वहीं शहरी क्षेत्रों में यह 1.83% से घटकर 0.88% पर दर्ज की गई।

CPI की मौजूदा सीरीज 2012 बेस ईयर पर आधारित

भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) महंगाई को मापने का सबसे प्रमुख पैमाना है। वर्तमान CPI सीरीज का बेस ईयर 2012 है। इसका अर्थ है कि 2012 की कीमतों को आधार मानकर (100 के रूप में) तुलना की जाती है। इसके पहले CPI की सीरीज 2010 और 1993-94 के बेस ईयर पर आधारित थीं। समय-समय पर सरकार इसे अपडेट करती रहती है ताकि आंकड़े वास्तविक आर्थिक परिस्थिति को बेहतर तरीके से दर्शा सकें।

बेस ईयर बदलने का उद्देश्य यह होता है कि महंगाई का आकलन पुराने नहीं बल्कि ताज़ा आर्थिक हालात और उपभोग पैटर्न के आधार पर हो। उदाहरण के तौर पर, आज से 15 साल पहले स्मार्टफोन या ऑनलाइन सेवाओं का खर्च आम उपभोक्ता की टोकरी में शामिल नहीं था, लेकिन अब वे एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

बेस ईयर क्या होता है और कैसे काम करता है

बेस ईयर वह साल होता है जिसकी कीमतों को ‘मानक’ या ‘आधार’ माना जाता है। उस वर्ष के दामों को 100 अंक दिए जाते हैं और बाद के वर्षों में उन्हीं कीमतों से तुलना की जाती है। इससे पता चलता है कि महंगाई बढ़ी है या घटी। उदाहरण के लिए, यदि 2020 में एक किलो टमाटर की कीमत ₹50 थी और 2025 में ₹80 हो गई, तो महंगाई 60% मानी जाएगी। यही फॉर्मूला CPI में लागू होता है, लेकिन यह सिर्फ टमाटर नहीं बल्कि पूरे उपभोक्ता बास्केट पर आधारित होता है जिसमें सैकड़ों वस्तुएं शामिल होती हैं — जैसे खाद्य पदार्थ, कपड़े, शिक्षा, ईंधन, स्वास्थ्य सेवाएं आदि।

कैसे चुना जाता है बेस ईयर

सरकार आमतौर पर हर 5 से 10 साल में बेस ईयर को बदलती है ताकि डेटा मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को सटीक रूप में दर्शा सके। नया बेस ईयर चुनते समय यह ध्यान रखा जाता है कि वह वर्ष सामान्य परिस्थितियों वाला हो — यानी न तो महामारी, न सूखा और न ही असामान्य महंगाई हो। इसी के आधार पर उस वर्ष की औसत कीमतों को 100 का मान देकर आने वाले वर्षों के आंकड़ों की तुलना की जाती है।

महंगाई में गिरावट के पीछे क्या कारण हैं

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, अक्टूबर महीने में खुदरा महंगाई में रिकॉर्ड गिरावट के पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण है खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट। सब्ज़ियों, दालों और अनाज के दाम में स्थिरता या कमी से आम उपभोक्ता को राहत मिली है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का भी असर ईंधन और परिवहन खर्चों पर पड़ा है।

साथ ही, मानसून सामान्य रहने से कृषि उत्पादन अच्छा हुआ है, जिससे बाजार में खाद्य आपूर्ति बढ़ी और कीमतें नियंत्रण में रहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू मांग में थोड़ी नरमी और आपूर्ति श्रृंखला में स्थिरता ने भी CPI को नीचे लाने में मदद की है।

सरकार और रिजर्व बैंक के लिए राहत भरी खबर

खुदरा महंगाई का यह स्तर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार दोनों के लिए राहत भरा संकेत है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के लिए महंगाई दर को 2% से 6% के दायरे में रखना प्राथमिक लक्ष्य होता है। अक्टूबर के आंकड़े इस सीमा से काफी नीचे हैं, जिससे भविष्य में ब्याज दरों में नरमी की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम महंगाई लंबे समय तक बनी रहना मुश्किल है, क्योंकि त्योहारों के बाद मांग बढ़ने से कीमतों में फिर से हल्की बढ़ोतरी संभव है।

इस तरह अक्टूबर 2025 का महीना उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। 14 साल में सबसे कम महंगाई दर ने न केवल लोगों की जेब पर बोझ घटाया है, बल्कि अर्थव्यवस्था को स्थिरता की दिशा में भी संकेत दिया है। आने वाले महीनों में सरकार की नीतियों और बाजार की मांग पर नजर रहेगी कि क्या यह राहत लंबी टिकती है या फिर कीमतों में दोबारा उछाल देखने को मिलता है।

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Author: THE CG NEWS

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