
देश में मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि यह मुद्दा नीतिगत दायरे में आता है और इस पर निर्णय लेना न्यायपालिका का नहीं, बल्कि विधायिका और कार्यपालिका का अधिकार है। अदालत के इस रुख ने एक बार फिर लोकतंत्र में नागरिकों की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के संतुलन पर बहस को तेज कर दिया है।
नीतिगत मामला बताकर कोर्ट ने खारिज की याचिका
सुनवाई के दौरान Supreme Court of India की तीन सदस्यीय बेंच ने स्पष्ट किया कि मतदान को अनिवार्य बनाने और वोट न डालने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आती। बेंच में Justice Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice Vipul M Pancholi शामिल थे। अदालत ने याचिकाकर्ता अजय गोयल को सुझाव दिया कि वे अपनी मांगों को लेकर संबंधित सरकारी और नीतिगत संस्थाओं से संपर्क करें।
याचिका में यह मांग की गई थी कि देश में मतदान को अनिवार्य किया जाए और जो लोग जानबूझकर मतदान नहीं करते, उनके लिए कुछ सरकारी सुविधाओं पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए जाएं। हालांकि अदालत ने इस प्रकार के निर्देश देने से इनकार कर दिया।
CJI का बयान: लोकतंत्र जागरूकता से मजबूत होता है, दबाव से नहीं
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर जोर देते हुए कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को मतदान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, न कि उन्हें मजबूर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में देश ने लोकतांत्रिक मूल्यों में गहरा विश्वास दिखाया है और यह उम्मीद की जाती है कि नागरिक स्वेच्छा से अपने मताधिकार का प्रयोग करें।
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर कोई व्यक्ति मतदान के लिए नहीं जाता, तो उसे इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, इस दिशा में सबसे जरूरी है जन-जागरूकता बढ़ाना, ताकि लोग स्वयं मतदान के महत्व को समझें और भागीदारी बढ़े।
व्यावहारिक कठिनाइयों का भी किया जिक्र
अदालत ने अनिवार्य मतदान कानून लागू करने में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं पर भी प्रकाश डाला। बेंच ने कहा कि चुनाव के दिनों में कई लोग अपने पेशेगत दायित्वों के कारण मतदान नहीं कर पाते, जिनमें न्यायपालिका से जुड़े लोग भी शामिल हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि इस तरह का कानून लागू होता है, तो एक जज को भी अपने राज्य जाकर मतदान करना पड़ेगा, भले ही उस दिन उसकी अदालत में महत्वपूर्ण कार्यवाही हो। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या घर पर रहना या मतदान न करना अपराध माना जा सकता है।
गरीब और मजदूर वर्ग की स्थिति पर चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत ने समाज के वंचित और श्रमिक वर्ग की स्थिति को लेकर भी चिंता व्यक्त की। बेंच ने कहा कि देश में ऐसे कई लोग हैं, जो रोजाना मजदूरी करके अपना जीवन यापन करते हैं। यदि उन्हें मतदान के लिए काम छोड़ना पड़े, तो उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।
अदालत ने सवाल किया कि अगर कोई गरीब व्यक्ति कहता है कि उसे अपनी दिहाड़ी कमानी है और वह मतदान नहीं कर सकता, तो क्या उसे इसके लिए दंडित करना उचित होगा। इस संदर्भ में अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों को नजरअंदाज कर अनिवार्य मतदान लागू करना व्यवहारिक नहीं होगा।
नीतिगत दायरे में आता है फैसला, सरकार पर जिम्मेदारी
याचिकाकर्ता ने यह भी सुझाव दिया था कि चुनाव आयोग को एक समिति बनाने का निर्देश दिया जाए, जो मतदान न करने वालों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर सुझाव दे। हालांकि अदालत ने इस प्रस्ताव को भी नीतिगत मामला बताते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदान को अनिवार्य बनाना एक जटिल और व्यापक नीति का विषय है, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और संवैधानिक पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अब इस मुद्दे पर आगे की कार्रवाई सरकार और चुनाव आयोग के स्तर पर ही संभव मानी जा रही है।
निष्कर्ष: जागरूकता ही समाधान, बाध्यता नहीं
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी जरूरी है, लेकिन उसे कानूनी दबाव के जरिए लागू नहीं किया जा सकता। इसके बजाय जागरूकता अभियान, शिक्षा और सामाजिक पहल के माध्यम से लोगों को मतदान के प्रति प्रेरित करना ही सबसे प्रभावी रास्ता है।
Author: THE CG NEWS
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