लोकसभा में सीट बढ़ाने का संविधान संशोधन बिल गिरा: मोदी सरकार पहली बार बहुमत जुटाने में नाकाम

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नई दिल्ली में संसद के विशेष सत्र के दौरान केंद्र सरकार को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब लोकसभा की सीटों में वृद्धि से जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक सदन में पारित नहीं हो सका। यह बिल लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह 54 वोटों से गिर गया। पिछले 12 वर्षों में यह पहला मौका है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार लोकसभा में कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने में असफल रही है।

दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा सकी सरकार

लोकसभा में इस विधेयक पर लगभग 21 घंटे तक विस्तृत चर्चा हुई, जिसके बाद मतदान कराया गया। कुल 528 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा लिया, जिनमें से 298 ने बिल के पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में 352 वोट बनता था। सरकार इस आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई।

एनडीए के पास लोकसभा में 293 सांसद हैं और सरकार केवल पांच अतिरिक्त सांसदों का समर्थन ही हासिल कर पाई। विपक्ष को अपने पक्ष में करने में सरकार पूरी तरह विफल रही, जिसके चलते यह ऐतिहासिक विधेयक गिर गया।

24 साल बाद संसद में सरकार की बड़ी हार

यह घटना संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है। वर्ष 2002 में आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) के बाद यह पहला अवसर है जब कोई सरकारी विधेयक संसद में गिरा है। वहीं, 1990 के बाद यह पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो लोकसभा में पारित नहीं हो सका।

सरकार ने इस सत्र में कुल तीन विधेयक पेश किए थे, जिनमें से केवल एक पर मतदान हुआ। परिसीमन संशोधन संविधान विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक 2026 को सरकार ने मतदान के लिए प्रस्तुत ही नहीं किया। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि ये दोनों विधेयक पहले बिल से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग से मतदान की आवश्यकता नहीं है।

महिला आरक्षण पर पड़ेगा सीधा असर

इस विधेयक के गिरने का सीधा असर महिला आरक्षण कानून पर पड़ेगा। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है, लेकिन इसके लागू होने के लिए परिसीमन जरूरी है। अब यह प्रक्रिया 2027 की जनगणना के बाद ही पूरी हो सकेगी, जिससे महिला आरक्षण का लाभ 2034 के लोकसभा चुनाव से पहले मिलने की संभावना कम हो गई है।

अगर यह विधेयक पारित हो जाता तो सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि होती और उसी अनुपात में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी बढ़ जातीं।

विपक्ष और सरकार आमने-सामने

विधेयक को लेकर सदन में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चर्चा के दौरान कहा कि उन्हें इस बिल का श्रेय नहीं चाहिए और वह इसके पारित होने पर सभी को धन्यवाद देने के लिए तैयार हैं। वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के खिलाफ मतदान को महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया और कहा कि देश की महिलाएं इसे माफ नहीं करेंगी।

दूसरी ओर विपक्ष ने इस विधेयक को संविधान और संघीय ढांचे पर हमला बताया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक नक्शा बदलने की कोशिश कर रही है। प्रियंका गांधी ने कहा कि यह जनता को गुमराह करने की रणनीति है, जबकि अखिलेश यादव ने इसे पिछड़े वर्गों के हितों के खिलाफ बताया।

परिसीमन पर उत्तर-दक्षिण विवाद

विपक्ष का मुख्य विरोध परिसीमन को लेकर था। उनका तर्क था कि नई सीमाओं के निर्धारण से दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कम हो सकती है, जबकि उत्तरी राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा। हालांकि, अमित शाह ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि दक्षिण भारत की सीटों में भी वृद्धि होगी और उनका प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा।

आगे क्या विकल्प हैं

इस हार के बाद सरकार के सामने कई विकल्प खुले हैं। वह इस विधेयक में संशोधन कर दोबारा पेश कर सकती है या विपक्ष के सुझावों को शामिल कर सहमति बनाने की कोशिश कर सकती है। इसके अलावा, परिसीमन के आधार और समय-सीमा में बदलाव कर भी नया प्रस्ताव लाया जा सकता है।

फिलहाल, इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि संसद में किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति आवश्यक है, और केवल संख्याबल के भरोसे ऐसे विधेयकों को पारित कराना संभव नहीं है।

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Author: THE CG NEWS

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