
भारतीय रुपया मंगलवार को डॉलर के मुकाबले इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। विदेशी फंड्स की लगातार निकासी और अमेरिकी बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच रुपया 25 पैसे टूटकर 90.21 पर बंद हुआ। यह पहली बार है जब भारतीय मुद्रा 90 के ऊपर बंद हुई है। इससे पहले सोमवार को यह 89.96 रुपए पर था। विशेषज्ञों का कहना है कि 2025 में रुपए की कमजोरी तेजी से बढ़ी है। इस वर्ष की शुरुआत में डॉलर-रुपया विनिमय दर 85.70 थी, जो अब रिकॉर्ड गिरावट के साथ 90.21 पर पहुंच गई। कुल मिलाकर रुपया इस साल 5.26% कमजोर हो चुका है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकेत है।
रुपए की इस गिरावट का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। तेल, सोना और विदेशी इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतें और अधिक महंगी हो सकती हैं। विदेश में पढ़ने या घूमने जाने वाले भारतीयों का खर्च भी लगभग 7–10% बढ़ जाएगा। वित्त विशेषज्ञों के अनुसार हर 1 रुपए की कमजोरी से आयात बिल पर भारी दबाव बनता है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका भी बढ़ सकती है। डॉलर महंगा होने से भारतीय कंपनियों को विदेशी उपकरणों, कच्चे तेल और मशीनरी का आयात महंगा पड़ेगा, जबकि एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक फायदा मिलेगा।
रुपये में गिरावट का असर: इम्पोर्ट होगा महंगा, छात्रों और यात्रियों का खर्च बढ़ेगा
रुपया कमजोर होने का मतलब है कि भारत को वस्तुओं और सेवाओं का आयात करने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे। उदाहरण के लिए जब डॉलर 50 रुपए का था, तब भारतीय छात्रों को अमेरिका में पढ़ाई के लिए 1 डॉलर पाने में 50 रुपए देने पड़ते थे। लेकिन अब यही छात्र 1 डॉलर के लिए 90.21 रुपए देंगे। इससे फीस, रहने के खर्च, परिवहन, बीमा और भोजन से लेकर हर चीज महंगी हो जाएगी। विदेशी यात्रा करने वाले भारतीयों की जेब पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। एयरलाइन टिकट, होटल, भोजन और शॉपिंग सभी ज्यादा लागत पर होंगे।
सोने और क्रूड ऑयल के आयात पर भी बड़ा असर पड़ेगा, क्योंकि दोनों की कीमतें सीधे डॉलर से जुड़ी होती हैं। सोने की कीमत घरेलू बाजारों में बढ़ सकती है क्योंकि आयातकों को पहले से अधिक पैसे खर्च करने होंगे। इसी तरह क्रूड महंगा होने से पेट्रोल-डीजल के दाम पर भी दबाव बढ़ता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर आम लोगों तक पहुंचता है।
रुपये में गिरावट की तीन बड़ी वजहें
पहली वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय आयात पर लगाया गया 50% टैरिफ है, जिसने वैश्विक व्यापार में अस्थिरता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन टैरिफ्स से भारत की GDP ग्रोथ 60–80 बेसिस पॉइंट्स तक गिर सकती है। आयात महंगा होता है और निर्यात का लाभ कम हो जाता है, जिससे डॉलर की आवक पर असर पड़ता है।
दूसरी वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारी बिकवाली है। जुलाई 2025 से अब तक FIIs भारतीय बाजार से 1.03 लाख करोड़ रुपए तक निकाल चुके हैं। निवेशकों में अमेरिकी ट्रेड टैरिफ्स और भू-राजनीतिक तनाव को लेकर अनिश्चितता है। जब FIIs भारतीय एसेट्स बेचते हैं तो वे इसे डॉलर में कन्वर्ट करते हैं, जिसकी वजह से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
तीसरी वजह तेल और सोना आयात करने वाली कंपनियों द्वारा हेजिंग के लिए डॉलर की तेज खरीद है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच आयातक कंपनियां भविष्य के जोखिम को देखते हुए बड़ी मात्रा में डॉलर खरीद रही हैं। इससे फॉरेक्स मार्केट में डॉलर की कमी और रुपया पर अधिक दबाव बना है।
RBI का हस्तक्षेप सीमित, गिरावट को रोक नहीं पाया बाज़ार
LKP सिक्योरिटीज के वीपी रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी के अनुसार पिछले कुछ हफ्तों में गिरावट का मुख्य कारण भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर स्पष्टता का न होना है। टाइमलाइन लगातार टलती जा रही है और बाजार में यह धारणा बन गई है कि फिलहाल किसी बड़े समझौते की संभावना कम है। त्रिवेदी ने कहा कि मेटल और सोने की ऊंची कीमतों ने भारत के आयात बिल को बढ़ा दिया है, जिससे रुपया लगातार दबाव में है। उन्होंने यह भी कहा कि इस बार RBI का हस्तक्षेप सीमित रहा है, जिसकी वजह से गिरावट तेज बनी हुई है।
बाजार को उम्मीद है कि आने वाली RBI पॉलिसी में केंद्रीय बैंक करेंसी को स्थिर करने के लिए कुछ कदमों की घोषणा कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार तकनीकी तौर पर रुपया अत्यधिक ओवरसोल्ड स्थिति में है और यहां से किसी भी समय रिवर्सल की संभावना बन सकती है, बशर्ते वैश्विक हालात में सुधार दिखे।
करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?
किसी भी देश की करेंसी की मजबूती या कमजोरी उसके विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार संतुलन और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी मांग पर निर्भर करती है। यदि किसी देश के फॉरेन रिजर्व में डॉलर कम होते हैं तो उसकी मुद्रा कमजोर होती है। वहीं रिजर्व बढ़ने पर मुद्रा मजबूत होती है।
डॉलर के मुकाबले अन्य मुद्राओं की कीमत घटने को करेंसी डेप्रिसिएशन कहा जाता है। यह प्रक्रिया तब तेज होती है जब देश में विदेशी निवेश कम आता है या वैश्विक तनावों की वजह से निवेशक सुरक्षित एसेट्स की ओर रुख करते हैं। यही वजह है कि आज रुपये में भारी गिरावट दर्ज की गई।
Author: THE CG NEWS
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