
बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास स्वामी को लेकर दिए गए अपने विवादित बयान पर आखिरकार माफी मांग ली है। नागपुर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि उनके बयान का गलत अर्थ निकाला गया और उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था। इस पूरे घटनाक्रम ने धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर तीखी बहस को जन्म दे दिया है।
नागपुर में सफाई, कहा—गलत तरीके से पेश किया गया बयान
नागपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने स्पष्ट किया कि वे शिवाजी महाराज के प्रति अत्यंत श्रद्धा रखते हैं और उनके बारे में नकारात्मक सोच भी नहीं सकते। उन्होंने कहा कि उनका बयान एक विशेष संदर्भ में था, जिसे काटकर अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया। शास्त्री के अनुसार, वे शिवाजी महाराज की अपने गुरु समर्थ रामदास स्वामी के प्रति भक्ति और समर्पण की चर्चा कर रहे थे, लेकिन उसे गलत अर्थों में लिया गया।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे महाभारत में अर्जुन और भगवान कृष्ण के बीच संवाद में कर्तव्य और धर्म का संदेश दिया गया, उसी तरह वे गुरु-शिष्य संबंध की भावना को समझाने की कोशिश कर रहे थे। उनका कहना था कि उनका मकसद केवल शिवाजी महाराज की महानता को उजागर करना था, न कि किसी तरह का विवाद पैदा करना।
क्या था विवादित बयान, जिससे बढ़ा विवाद
दरअसल, नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा था कि शिवाजी महाराज युद्धों से थक चुके थे और उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां छोड़ने की इच्छा जताई थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि शिवाजी महाराज अपना मुकुट लेकर समर्थ रामदास स्वामी के पास पहुंचे और उसे उनके चरणों में रख दिया। इसके बाद गुरु ने उन्हें कर्तव्य का महत्व समझाते हुए मुकुट वापस उनके सिर पर रख दिया।
इस बयान के सामने आते ही कई संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत बताते हुए विरोध जताया। आलोचकों का कहना था कि इस तरह के बयान इतिहास को विकृत करने का प्रयास हैं और इससे समाज में भ्रम फैल सकता है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया से गरमाया माहौल
इस विवाद ने जल्द ही राजनीतिक रूप ले लिया। पूर्व राज्यसभा सदस्य संभाजीराजे छत्रपति ने शास्त्री के बयान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उन्हें अपने ही देश और क्षेत्र के इतिहास की सही जानकारी नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसे लोगों के कार्यक्रमों पर रोक लगाई जानी चाहिए।
वहीं महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इसे इतिहास बदलने की साजिश बताया और कार्यक्रम में मौजूद नेताओं से माफी की मांग की। दूसरी ओर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि इतिहास की पुस्तकों में इस तरह का कोई उल्लेख नहीं मिलता और लोगों को जिम्मेदारी से बयान देना चाहिए।
शिवसेना (UBT) के नेता संजय राउत ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शिवाजी महाराज एक स्वतंत्र और संप्रभु शासक थे और इस प्रकार की टिप्पणी करना ऐतिहासिक रूप से गलत और अपमानजनक है। एनसीपी (शरद पवार गुट) के विधायक रोहित पवार ने भी कड़ी नाराजगी जताते हुए शास्त्री के महाराष्ट्र में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की।
चार बच्चों वाले बयान पर भी दी सफाई
इसी कार्यक्रम में धीरेंद्र शास्त्री द्वारा दिए गए “चार बच्चे पैदा करने” वाले बयान पर भी विवाद खड़ा हो गया था। इस पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि उनका आशय किसी विशेष संख्या से नहीं था, बल्कि वे यह कहना चाहते थे कि बच्चों को राष्ट्रवादी और संस्कारित बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि “संघ को पुत्र देने” का अर्थ है कि बच्चे देश और समाज के प्रति जिम्मेदार बनें, चाहे वे किसी भी पेशे में क्यों न जाएं।
माफी के साथ विवाद थमने की कोशिश
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने बयान के अंत में कहा कि यदि उनके शब्दों से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो वे इसके लिए क्षमा मांगते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिवाजी महाराज में आस्था रखने वाले सभी लोग उनके अपने हैं और ऐसे मुद्दों पर आपसी विवाद से समाज को नुकसान ही होगा।
हालांकि, उनकी माफी के बावजूद यह मुद्दा पूरी तरह शांत होता नजर नहीं आ रहा है। धार्मिक आस्था, इतिहास और राजनीति के इस मिश्रण ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान किस तरह व्यापक विवाद का कारण बन सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस मामले पर और क्या प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं और क्या यह विवाद यहीं थमता है या आगे भी राजनीतिक बहस को हवा देता है।
Author: THE CG NEWS
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