राजस्थान रॉयल्स की डील पर विवाद: सोमानी ग्रुप ने नीलामी प्रक्रिया पर उठाए सवाल, मित्तल-पूनावाला कंसोर्टियम बना नया मालिक

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आईपीएल की चर्चित फ्रेंचाइजी राजस्थान रॉयल्स एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह मैदान का प्रदर्शन नहीं बल्कि मालिकाना हक से जुड़ा विवाद है। फ्रेंचाइजी की हालिया नीलामी प्रक्रिया पर अमेरिकी कारोबारी काल सोमानी के नेतृत्व वाले सोमानी ग्रुप ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रुप का कहना है कि उन्हें इस पूरी प्रक्रिया में निष्पक्ष अवसर नहीं दिया गया और अंतिम निर्णय पारदर्शी तरीके से नहीं लिया गया।

नीलामी प्रक्रिया पर उठे पारदर्शिता के सवाल

सोमानी ग्रुप ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी निराशा जाहिर की है। उनके मुताबिक वे पिछले छह महीनों से इस डील की दौड़ में सबसे आगे थे और उन्होंने कभी अपनी बोली वापस नहीं ली। जबकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया था कि उन्होंने खुद ही प्रक्रिया से हटने का फैसला लिया था। ग्रुप का कहना है कि यह जानकारी गलत और भ्रामक है।

सोमानी ग्रुप ने यह भी दावा किया कि उनकी बोली करीब 1.63 बिलियन डॉलर (लगभग 15,400 करोड़ रुपए) की थी और उनके पास पर्याप्त फंडिंग भी उपलब्ध थी। इसके बावजूद अंतिम समय में उनकी बोली को नजरअंदाज कर दिया गया, जो इस तरह की बड़ी नीलामी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।

मित्तल-पूनावाला कंसोर्टियम ने खरीदी हिस्सेदारी

दूसरी ओर, दिग्गज उद्योगपति लक्ष्मी निवास मित्तल और उनके बेटे आदित्य मित्तल ने अदार पूनावाला के साथ मिलकर राजस्थान रॉयल्स की 93% हिस्सेदारी करीब 15,600 करोड़ रुपए में खरीद ली है। इस डील के तहत मित्तल परिवार के पास लगभग 75% हिस्सेदारी होगी, जबकि पूनावाला के पास 18% हिस्सेदारी रहेगी। शेष 7% हिस्सेदारी पुराने निवेशकों के पास ही बनी रहेगी।

नई संरचना के तहत टीम के बोर्ड में लक्ष्मी मित्तल, आदित्य मित्तल, वनीषा मित्तल-भाटिया, अदार पूनावाला और मौजूदा मालिक मनोज बडाले शामिल होंगे। इस सौदे के बाद राजस्थान रॉयल्स आईपीएल की सबसे महंगी फ्रेंचाइजी में शामिल हो गई है।

मौजूदा मालिकों का पक्ष

सूत्रों के अनुसार, मौजूदा मालिकों ने सोमानी ग्रुप की बोली में कुछ तकनीकी और दस्तावेजी कमियां पाई थीं। बताया जा रहा है कि जांच के दौरान उनके दस्तावेज तय मानकों पर खरे नहीं उतरे, जिसके चलते उनकी बोली को अंतिम मंजूरी नहीं दी गई। हालांकि सोमानी ग्रुप ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह उनकी छवि खराब करने की कोशिश है और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है।

टीम का गौरवशाली और विवादित इतिहास

राजस्थान रॉयल्स का इतिहास आईपीएल में काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। टीम ने 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग के पहले ही सीजन में खिताब जीतकर सबको चौंका दिया था। उस समय टीम की कप्तानी दिग्गज ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर शेन वॉर्न कर रहे थे। हालांकि इसके बाद टीम का प्रदर्शन उतार-चढ़ाव भरा रहा और वह सिर्फ एक बार 2022 में फाइनल तक पहुंच पाई, जहां उसे हार का सामना करना पड़ा।

टीम का नाम 2015 के स्पॉट-फिक्सिंग विवाद में भी सामने आया था, जिसके चलते उसे दो साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। जांच के बाद लोढ़ा समिति ने सह-मालिक राज कुंद्रा को सट्टेबाजी का दोषी पाया था। इसके बाद राजस्थान रॉयल्स को 2016 और 2017 के सीजन से बाहर कर दिया गया था। 2018 में टीम ने फिर से आईपीएल में वापसी की।

आईपीएल में बढ़ती निवेश रुचि

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखाया है कि आईपीएल फ्रेंचाइजियों में निवेश को लेकर वैश्विक स्तर पर कितनी प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। बड़ी-बड़ी कंपनियां और उद्योगपति अब क्रिकेट टीमों में निवेश को एक आकर्षक अवसर के रूप में देख रहे हैं। राजस्थान रॉयल्स की डील इसका ताजा उदाहरण है, जहां अरबों रुपये का निवेश किया गया है।

आगे क्या होगा

अब इस विवाद के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सोमानी ग्रुप इस मामले को कानूनी रूप देता है या नहीं। यदि ऐसा होता है तो यह मामला और लंबा खिंच सकता है और आईपीएल की नीलामी प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल, नए मालिकों के साथ राजस्थान रॉयल्स एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन इस डील पर उठे सवाल आने वाले समय में और गहराने की संभावना है।

निष्कर्ष

राजस्थान रॉयल्स की मालिकाना हिस्सेदारी को लेकर उठा यह विवाद केवल एक फ्रेंचाइजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आईपीएल जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर पारदर्शिता और निष्पक्षता के सवाल भी खड़े करता है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और स्पष्टता सामने आने की उम्मीद है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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