
छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्रप्रदेश की सीमाओं से जुड़ा एक बड़ा गौ-तस्करी नेटवर्क सामने आया है। गरियाबंद जिले के सीमावर्ती इलाकों से हर सप्ताह बड़ी संख्या में गाय-बैल ओडिशा के रास्ते आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कसाईघरों तक पहुंचाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर सक्रिय यह नेटवर्क गांव-गांव तक फैला हुआ है, जहां एजेंट किसान बनकर घूमते हैं और बेहद कम कीमत पर बूढ़े तथा कमजोर मवेशियों की खरीदारी करते हैं।
गरियाबंद जिले के देवभोग से करीब 8 किलोमीटर दूर ओडिशा सीमा शुरू होती है। शुक्रवार देर रात बीजू एक्सप्रेस-वे किनारे गाय-बछड़ों के बड़े झुंड के साथ कुछ लोग बैठे मिले। पूछताछ में पहले वे घबरा गए, फिर खुद को किसान बताते हुए कहा कि वे मवेशियों को बेचने के लिए धरमगढ़ बाजार ले जा रहे हैं। हालांकि स्थानीय लोगों और पड़ताल में सामने आया कि यह कोई सामान्य पशु व्यापार नहीं, बल्कि एक संगठित तस्करी नेटवर्क का हिस्सा है।
धरमगढ़ मंडी बना तस्करी का बड़ा केंद्र
ओडिशा के कालाहांडी जिले के धरमगढ़ में हर शुक्रवार बड़े स्तर पर मवेशी बाजार लगता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक यहां हर सप्ताह पांच हजार से अधिक गाय-बैल खरीदे और बेचे जाते हैं। आरोप है कि इनमें से अधिकांश मवेशी बाद में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कसाईघरों तक पहुंच जाते हैं।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि मंडी में आने वाले अधिकांश खरीदार किसान नहीं बल्कि बड़े एजेंट और सप्लायर होते हैं। बाजार के बाहर महंगी SUVs और लग्जरी वाहनों की मौजूदगी भी इस अवैध कारोबार की ओर संकेत करती है। बताया जाता है कि मवेशियों को मंडी से सीधे ट्रकों में नहीं ले जाया जाता, बल्कि पकड़े जाने के डर से पहले पैदल जंगल और घाटी वाले रास्तों से सीमा तक पहुंचाया जाता है।
गांव-गांव घूमते हैं एजेंट
गौ-तस्करी का नेटवर्क सीमावर्ती गांवों तक फैला हुआ है। छोटे एजेंट गांवों में घूमकर बूढ़ी और कमजोर गाय-बैल 1000 से 1500 रुपए में खरीदते हैं। हर गांव से 10 से 20 मवेशियों को इकट्ठा किया जाता है और शुक्रवार को धरमगढ़ मंडी पहुंचाया जाता है। ग्रामीणों को नकद भुगतान पहले ही कर दिया जाता है।
एक एजेंट हर सप्ताह 50 से 100 मवेशियों का सौदा करता है। मंडी में नियमों के तहत मवेशी ले जाने के लिए केवल 100 रुपए की रसीद कटती है, चाहे एक पशु हो या सौ। आरोप है कि मंडी कर्मचारियों को भी पता रहता है कि खरीदारी करने वाले लोग किसान नहीं बल्कि तस्करी नेटवर्क से जुड़े एजेंट हैं।
150 किलोमीटर पैदल पार कराई जाती है सीमा
तस्करी का सबसे बड़ा हिस्सा मवेशियों को सीमा पार कराना होता है। इसके लिए प्रशिक्षित मजदूर लगाए जाते हैं। करीब 40 से 50 मवेशियों के साथ चार मजदूर चलते हैं, जिनका काम उन्हें चराते हुए ओडिशा से आंध्रप्रदेश सीमा तक पहुंचाना होता है।
धरमगढ़ से लगभग 150 किलोमीटर दूर आंध्रप्रदेश सीमा के जयपुर, मानापुर और आमपानी घाटी तक मवेशियों को दो से तीन दिन में पहुंचाया जाता है। इस दौरान जंगल और घाटी वाले रास्तों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि पुलिस या प्रशासन की नजर से बचा जा सके।
बताया जाता है कि 1500 रुपए में खरीदे गए मवेशियों पर लगभग 500 रुपए का परिवहन खर्च आता है, जबकि आंध्रप्रदेश सीमा पर इन्हें 4000 रुपए तक में बेच दिया जाता है। इसके बाद इन पशुओं को विभिन्न शहरों के कसाईघरों तक भेजा जाता है।
गरियाबंद बना सप्लाई का बड़ा स्रोत
मंडी के कुछ कर्मचारियों का दावा है कि यहां सबसे ज्यादा मवेशी छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से लाए जाते हैं। पहले महासमुंद और पिथौरा मार्ग से मवेशियों की सप्लाई होती थी, लेकिन कार्रवाई और पकड़े जाने के डर से अब तस्कर जंगल और सीमावर्ती रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गरियाबंद का सीमावर्ती इलाका पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार के लिए ओडिशा पर निर्भर रहा है। अब इसी संपर्क का इस्तेमाल गौ-तस्करी नेटवर्क कर रहा है। सीमाओं पर कमजोर निगरानी और राज्यों के बीच समन्वय की कमी के कारण यह अवैध कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है।
छह साल में केवल 21 मामले दर्ज
आंकड़े बताते हैं कि 2020 से अप्रैल 2026 तक गरियाबंद जिले में गौ-तस्करी के केवल 21 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 52 लोगों की गिरफ्तारी हुई। सबसे ज्यादा 8 मामले पिछले साल सामने आए। स्थानीय संगठनों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन की प्राथमिकता में गौ-तस्करी रोकना शामिल नहीं है, इसलिए अधिकतर मामलों में कार्रवाई तब होती है जब सामाजिक संगठन या ग्रामीण सूचना देते हैं।
हालांकि गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने कहा कि उन्हें फिलहाल जिले से मवेशी तस्करी की जानकारी नहीं है, लेकिन यदि ऐसे तथ्य सामने आते हैं तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। वहीं एसपी नीरज चंद्राकर ने दावा किया कि सरहदी इलाकों में निगरानी बढ़ाई गई है और पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है।
फिलहाल सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय यह ‘ट्रायंगल कॉरिडोर’ प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
Author: THE CG NEWS
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