कच्चे तेल की तेजी से बढ़ा दबाव: पेट्रोल-डीजल पर नुकसान में तेल कंपनियां, गैस और खाद पर भी भारी बोझ

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच देश की तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल को घाटे में बेचने को मजबूर हो गई हैं। रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुसार कंपनियां पेट्रोल पर करीब 14 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 18 रुपए प्रति लीटर का नुकसान झेल रही हैं। इसके बावजूद उपभोक्ताओं के लिए रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की गई है, जिससे कंपनियों की मार्जिन पर सीधा असर पड़ा है और मुनाफा लगभग खत्म हो गया है।

मिडिल ईस्ट तनाव से कच्चा तेल 120 डॉलर के पार

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है। कुछ समय पहले जो कच्चा तेल 70 से 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मिल रहा था, वह अब बढ़कर 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है। इंडियन बास्केट की कीमत भी महज 61 दिनों में 71 डॉलर से बढ़कर 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इसी तरह ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तेल कंपनियों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे महंगा कच्चा तेल खरीद रही हैं, लेकिन उसे पुराने रिटेल रेट पर ही बेचने के लिए बाध्य हैं।

स्ट्रैट ऑफ होर्मुज पर संकट से बढ़ी चिंता

दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का व्यापार स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के रास्ते होता है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि केमिकल, प्लास्टिक और उर्वरक उद्योगों पर भी पड़ रहा है। कच्चे माल की लागत बढ़ने से इन क्षेत्रों में उत्पादन महंगा हो गया है।

रसोई गैस पर 80 हजार करोड़ का बोझ

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर रसोई गैस पर भी पड़ा है। कंपनियों को लागत से कम कीमत पर एलपीजी सिलेंडर बेचना पड़ रहा है, जिससे इस वर्ष करीब 80 हजार करोड़ रुपए की अंडर-रिकवरी का अनुमान लगाया जा रहा है। अंडर-रिकवरी का मतलब है कि जब किसी उत्पाद की लागत अधिक होती है लेकिन उसे कम कीमत पर बेचना पड़ता है, तो जो अंतर होता है वह नुकसान के रूप में सामने आता है। फिलहाल तेल कंपनियां इसी स्थिति का सामना कर रही हैं।

खाद सब्सिडी का बोझ भी बढ़ा

ऊर्जा संकट का असर कृषि क्षेत्र तक पहुंच चुका है। यूरिया जैसे उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस का उपयोग होता है, जिसकी कीमत बढ़ने से खाद बनाने की लागत भी बढ़ गई है। सरकार ने पहले खाद सब्सिडी के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया था, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह खर्च बढ़कर 2.25 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की आशंका है। इससे सरकार के वित्तीय बोझ में भी इजाफा होगा।

सीएनजी और उद्योगों पर बढ़ता दबाव

शहरी परिवहन में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी पर भी इस संकट का असर दिखने लगा है। कंपनियां बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पा रही हैं, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा केमिकल, प्लास्टिक और उर्वरक उद्योगों के लिए भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। रेटिंग एजेंसियों ने इन सेक्टरों के भविष्य को नकारात्मक बताया है।

आगे क्या रह सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव और वैश्विक अस्थिरता कम नहीं होती, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा। फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन लंबे समय तक यह स्थिति बनी रही तो कीमतों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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