रील स्क्रॉलिंग बन रही नई डिजिटल लत: जंक फूड की तरह दिमाग पर असर, बच्चों में बढ़ रही फोन एडिक्शन की समस्या

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मोबाइल फोन और सोशल मीडिया आज लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन लगातार रील स्क्रॉलिंग अब मानसिक और व्यवहारिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी-छोटी वीडियो देखने की आदत दिमाग पर उसी तरह असर डाल रही है, जैसे जंक फूड शरीर पर असर डालता है। इससे याददाश्त, फोकस और मानसिक संतुलन कमजोर होने लगा है। खास चिंता की बात यह है कि माता-पिता का बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों में भी मोबाइल एडिक्शन को तेजी से बढ़ा रहा है।

मनोवैज्ञानिकों और न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार, इंस्टेंट एंटरटेनमेंट देने वाली रील्स दिमाग को लगातार तेज उत्तेजना देती हैं। इससे दिमाग धीरे-धीरे लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता खोने लगता है। यही वजह है कि अब बच्चों से लेकर युवाओं तक में ध्यान भटकना, पढ़ाई में मन न लगना और छोटी-छोटी बातों को भूलने जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

क्यों खतरनाक बन रही है रील स्क्रॉलिंग

विशेषज्ञ बताते हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आने वाली रील्स और शॉर्ट वीडियो दिमाग में डोपामिन रिलीज करती हैं। डोपामिन वही केमिकल है जो खुशी और उत्साह का अनुभव कराता है। जब व्यक्ति लगातार नई-नई रील्स देखता है, तो दिमाग जल्दी-जल्दी मनोरंजन पाने का आदी हो जाता है।

इसका असर यह होता है कि किताब पढ़ना, पढ़ाई करना या किसी गंभीर काम पर लंबे समय तक ध्यान देना मुश्किल लगने लगता है। डॉक्टरों के मुताबिक, यह प्रक्रिया धीरे-धीरे डिजिटल एडिक्शन में बदल सकती है। कई मामलों में लोग बिना किसी जरूरत के भी बार-बार फोन चेक करने लगते हैं।

मेमोरी और फोकस पर पड़ रहा असर

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार स्क्रीन देखने से दिमाग की सूचना याद रखने की क्षमता प्रभावित होती है। शॉर्ट कंटेंट देखने की आदत के कारण दिमाग तेजी से बदलती जानकारी का आदी हो जाता है, जिससे गहरी सोचने और जानकारी को लंबे समय तक याद रखने की क्षमता कम होने लगती है।

स्कूल और कॉलेज के छात्रों में इसका असर ज्यादा दिखाई दे रहा है। शिक्षक और अभिभावक शिकायत कर रहे हैं कि बच्चे पढ़ाई के दौरान कुछ ही मिनटों में ध्यान खो देते हैं। कई बच्चों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी और नींद की समस्या भी बढ़ रही है।

माता-पिता की आदतें भी बन रहीं वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में मोबाइल एडिक्शन का एक बड़ा कारण घर का माहौल भी है। यदि माता-पिता खुद लंबे समय तक मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, तो बच्चे भी उसी व्यवहार को अपनाने लगते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, छोटे बच्चे अपने आसपास के व्यवहार की नकल जल्दी करते हैं। यदि परिवार में खाने के दौरान, बातचीत के समय या सोने से पहले लगातार फोन इस्तेमाल हो रहा है, तो बच्चों के लिए यह सामान्य आदत बन जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई माता-पिता बच्चों को शांत रखने के लिए कम उम्र में ही मोबाइल दे देते हैं। इससे बच्चे धीरे-धीरे स्क्रीन पर निर्भर होने लगते हैं और बिना मोबाइल के चिड़चिड़े हो जाते हैं।

नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर

डॉक्टरों के अनुसार, देर रात तक मोबाइल चलाने से नींद की गुणवत्ता खराब होती है। स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर के प्राकृतिक स्लीप साइकल को प्रभावित करती है। पर्याप्त नींद न मिलने से मानसिक थकान, तनाव और मूड स्विंग की समस्या बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लगातार सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले लोगों में चिंता, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की लाइफस्टाइल देखकर कई लोग खुद की तुलना करने लगते हैं, जिससे मानसिक दबाव बढ़ता है।

कैसे करें बचाव

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन संतुलन बेहद जरूरी है। परिवार में ‘नो फोन टाइम’ तय करना फायदेमंद हो सकता है। खाने के समय, पढ़ाई के दौरान और सोने से पहले मोबाइल इस्तेमाल कम करना चाहिए।

बच्चों के स्क्रीन टाइम पर निगरानी रखना जरूरी है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि छोटे बच्चों को लंबे समय तक मोबाइल या टैबलेट न दिया जाए। आउटडोर गेम्स, किताबें पढ़ने और परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियां डिजिटल निर्भरता कम करने में मदद कर सकती हैं।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माता-पिता को खुद उदाहरण बनना होगा। यदि बड़े लोग स्क्रीन टाइम नियंत्रित करेंगे, तो बच्चों पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा।

तकनीक आज की जरूरत है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर स्क्रीन और रील्स की आदत पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

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Author: THE CG NEWS

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