
भारत में बच्चों की मौत से जुड़ा कोल्ड्रिफ सिरप मामला अब गंभीर मोड़ पर पहुँच गया है। अब तक कम से कम 23 बच्चों की मौत हुई है, जिनमें अधिकांश बच्चे मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब से हैं। इन मौतों का संबंध ‘कोल्ड्रिफ’ नामक कफ सिरप से जोड़ा जा रहा है, जिसे श्रीसन फार्मास्युटिकल्स नामक कंपनी ने उत्पादित किया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस सिरप में डाईथाइलिन ग्लाइकॉल (DEG) की मात्रा अत्यधिक पाई गई है, जो एक जहरीला रासायनिक यौगिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस रसायन की अधिक मात्रा से बच्चों में किडनी फेल्योर, उल्टी, दस्त और पेशाब में रुकावट जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में डॉ. प्रवीण सोनी नामक एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया गया है, जिन्होंने इस सिरप को बच्चों को निर्धारित किया था। उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है और अब पुलिस द्वारा पूरी गहनता से जांच की जा रही है।
राज्य सरकारों की कार्रवाई
कई राज्यों ने इस सिरप को लेकर सख्त कदम उठाए हैं। मध्य प्रदेश में 17 बच्चों की मौत के बाद, राज्य सरकार ने तुरंत कोल्ड्रिफ सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया और कंपनी के खिलाफ जांच शुरू की। उत्तर प्रदेश में भी सिरप की बिक्री पर रोक लगाई गई है और स्वास्थ्य विभाग द्वारा विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं। पंजाब और उत्तराखंड सरकार ने भी इस सिरप के उपयोग और बिक्री पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही गुजरात सरकार ने दो फार्मास्युटिकल कंपनियों के उत्पादन पर रोक लगाई और उनके उत्पादों की बाजार से वापसी सुनिश्चित की। इन सभी राज्यों में स्वास्थ्य विभाग और एफडीए की टीमें लगातार छापेमारी कर रही हैं ताकि किसी भी संभावित खतरनाक दवा के वितरण को रोका जा सके।
सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
मामले की गंभीरता को देखते हुए, वकील विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की है। इस याचिका में उन्होंने तत्काल प्रभाव से कोल्ड्रिफ सिरप और इससे जुड़े अन्य उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने, मामले की सीबीआई द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने, पूर्व न्यायाधीश की निगरानी में जांच प्रक्रिया संचालित करने और सभी कफ सिरप उत्पादों की अनिवार्य परीक्षण और नैतिकता मानकों की पुष्टि कराने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे जहरीले सिरपों का बच्चों पर कोई चिकित्सीय लाभ नहीं है, बल्कि ये हानिकारक साबित हो सकते हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस मामले में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारों को नोटिस जारी किया है। आयोग ने निर्देश दिए हैं कि इस घटना की गंभीरता से जांच की जाए, दवाओं के नमूनों का परीक्षण किया जाए और सभी नकली या हानिकारक दवाओं की बिक्री पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए। आयोग ने इन राज्यों से दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। मानवाधिकार संगठनों और जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से अपील की है कि बच्चों के लिए अव्यावहारिक कफ सिरप पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाया जाए।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में खांसी और जुकाम के इलाज के लिए अव्यावहारिक कफ सिरप का उपयोग सीमित किया जाना चाहिए। राजस्थान स्वास्थ्य विभाग ने नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनमें हाइड्रेशन, आराम, शहद (एक वर्ष से ऊपर के बच्चों के लिए), सलाइन नासल ड्रॉप्स और स्टीम इनहलेशन जैसी गैर-फार्मास्युटिकल उपचार विधियों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। इसके अलावा, डेक्सट्रोमेथॉरफन युक्त सिरपों को चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है।
आगे की राह
यह मामला दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की गंभीरता को उजागर करता है और यह दिखाता है कि किस प्रकार एक लापरवाहीपूर्ण उत्पाद कई राज्यों में बच्चों की जान ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और भविष्य में इस तरह की त्रासदी से बचने के लिए कड़े नियामक कदम उठाए जाने चाहिए। इस मामले में जांच पूरी होने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी और दोषियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सरकार, स्वास्थ्य विभाग और फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए यह चेतावनी है कि बच्चों की सुरक्षा सबसे पहले रखी जानी चाहिए।
Author: THE CG NEWS
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