पेरेंटिंग: बच्चे घर के कामों में हाथ नहीं बंटाते, मामूली सा काम भी उन्हें सजा लगता है — कैसे सिखाएं जिम्मेदारी

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आज की पीढ़ी तकनीक के युग में पल रही है, जहां बच्चों का ध्यान मोबाइल, वीडियो गेम और ऑनलाइन क्लास जैसी चीज़ों में ज्यादा रहता है। ऐसे में घर के कामों की जिम्मेदारी उनके लिए सजा जैसी लगती है। बहुत से माता-पिता शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे बर्तन धोने, कपड़े तह करने या कमरे की सफाई जैसे साधारण कामों में भी मदद नहीं करते। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बच्चों के व्यवहार और मानसिक विकास को प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ आदत का नहीं बल्कि पेरेंटिंग स्टाइल का भी असर है।

घर का काम बच्चों को क्यों लगता है बोझ

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब बचपन से बच्चों को घरेलू कामों में शामिल नहीं किया जाता, तो वे उसे ‘अपना दायित्व’ नहीं बल्कि ‘मां-बाप का काम’ मानने लगते हैं। बच्चों को यह सिखाया ही नहीं जाता कि घर की सफाई या बर्तन धोना भी एक तरह की जिम्मेदारी है जो हर सदस्य की होती है। इसके अलावा माता-पिता का अत्यधिक लाड़-प्यार, हर सुविधा तुरंत उपलब्ध करवा देना और बच्चों को किसी कठिनाई से बचाना भी उनमें जिम्मेदारी की भावना को कमजोर कर देता है।

आज के बच्चे ऐसे माहौल में बड़े हो रहे हैं, जहां तकनीक सब कुछ आसान बना देती है। उन्हें खाना बनाने की ज़रूरत नहीं, कपड़े मशीन धो देती है, और घर के कामों के लिए अक्सर नौकर या हाउस हेल्प मौजूद होते हैं। ऐसे में जब उन्हें किसी काम के लिए कहा जाता है, तो वे उसे “सजा” की तरह लेते हैं।

जिम्मेदारी सिखाने का महत्व

बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ. ममता खन्ना का कहना है कि घर के छोटे-छोटे काम बच्चों के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब बच्चे अपने खिलौने खुद समेटते हैं, अपना बिस्तर ठीक करते हैं या माता-पिता की छोटी-छोटी मदद करते हैं, तो उनमें आत्मनिर्भरता, अनुशासन और समय प्रबंधन की भावना विकसित होती है। जो बच्चे घर के कामों में हिस्सा लेते हैं, वे बड़े होकर ज़्यादा जिम्मेदार और सहयोगी साबित होते हैं।

डॉ. खन्ना बताती हैं कि जब बच्चा किसी काम को सफलतापूर्वक पूरा करता है, तो उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है। वहीं, अगर उसे हमेशा काम से दूर रखा जाए, तो उसे “मेरे काम मेरे लिए कोई और करेगा” वाली सोच पनप जाती है। यही मानसिकता आगे चलकर उनके प्रोफेशनल और सामाजिक जीवन पर भी असर डालती है।

माता-पिता की भूमिका सबसे अहम

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को घर के कामों में शामिल करने की शुरुआत माता-पिता से ही होनी चाहिए। बच्चे वही करते हैं जो वे देखते हैं। अगर माता-पिता खुद सक्रिय रूप से घर के कामों में शामिल हों और खुशी से अपनी जिम्मेदारी निभाएं, तो बच्चे भी प्रेरित होते हैं।

साथ ही, माता-पिता को बच्चों के काम की सराहना करनी चाहिए। जब बच्चा कोई छोटा-सा काम करे, तो उसकी प्रशंसा करें — “बहुत अच्छा किया बेटा, अब घर और जल्दी साफ हुआ” जैसे वाक्य उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। कई बार माता-पिता बच्चों के छोटे कामों को भी “गलत किया” कहकर रोक देते हैं, जिससे उनमें हताशा बढ़ती है और वे दोबारा कोशिश नहीं करते।

छोटे कदमों से शुरू करें बदलाव

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि बच्चों को जिम्मेदार बनाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू करनी चाहिए। शुरुआत छोटी जिम्मेदारियों से करें — जैसे स्कूल बैग खुद तैयार करना, जूते पॉलिश करना या अपने बर्तन खुद रसोई तक ले जाना। धीरे-धीरे उन्हें रसोई या सफाई में भी मदद के लिए प्रोत्साहित करें।

बच्चों को यह महसूस कराना ज़रूरी है कि घर केवल माता-पिता का नहीं बल्कि सभी का है, और सभी का योगदान समान रूप से ज़रूरी है। जब परिवार में हर व्यक्ति एक-दूसरे की मदद करता है, तो बच्चों में सहयोग और टीमवर्क की भावना विकसित होती है।

सकारात्मक संवाद और प्रोत्साहन जरूरी

अगर बच्चा किसी काम से इनकार करे तो गुस्सा करने या डांटने के बजाय संवाद करें। उसे समझाएं कि घर के कामों से वह खुद को बेहतर बना सकता है। माता-पिता को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिम्मेदारी सिखाने की प्रक्रिया दबाव नहीं बल्कि एक साझेदारी की तरह हो।

निष्कर्ष

बच्चों को जिम्मेदार बनाना केवल अनुशासन सिखाना नहीं बल्कि उन्हें जीवन के प्रति तैयार करना है। जब वे घर के छोटे-छोटे कामों को जिम्मेदारी के साथ करना सीखते हैं, तो वही गुण आगे चलकर उनके करियर, रिश्तों और समाज में व्यवहार में दिखाई देता है। आज के दौर में जब हर चीज़ डिजिटल हो चुकी है, तो बच्चों को असली जीवन की जिम्मेदारियों से जोड़ना और भी आवश्यक हो गया है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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