चीन बन रहा एशिया का नया करेंसी प्रिंटिंग हब: भारत के 5 पड़ोसी देश करा रहे हैं नोट छपाई, नेपाल ने 43 करोड़ नोटों का कॉन्ट्रैक्ट चीन को सौंपा

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एशिया में करेंसी प्रिंटिंग का नक्शा तेजी से बदल रहा है। भारत के पड़ोसी देश अब नोट छपवाने के लिए चीन को प्राथमिकता दे रहे हैं। नेपाल ने हाल ही में 1000 रुपए के 43 करोड़ नोटों की छपाई का टेंडर जारी किया, जिसे चीन की सरकारी कंपनी चाइना बैंक नोट प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन (CBPMC) ने जीत लिया। 1945 से 1955 तक नेपाल अपने नोट भारत के नासिक प्रेस में छपवाता था और उसके बाद भी भारत ही उसका मुख्य साझेदार रहा। लेकिन 2015 के बाद से नेपाल ने धीरे-धीरे चीन की ओर रुख कर लिया और अब उसकी अधिकांश करेंसी चीन में छप रही है।

श्रीलंका, बांग्लादेश, मलेशिया, थाईलैंड भी चीन पर निर्भर, भारत की भूमिका कम हुई

नेपाल के अलावा श्रीलंका, बांग्लादेश, मलेशिया और थाईलैंड भी अपनी करेंसी चीन में छपवा रहे हैं। बांग्लादेश ने 2010 से, श्रीलंका ने 2015 से और मलेशिया ने 2010 के बाद से नोटों की प्रिंटिंग चीन को सौंपना शुरू किया। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, थाईलैंड भी 2018 से नोट छपवाने के लिए चीन के साथ जुड़ा है। कई देशों ने कम लागत, उन्नत सुरक्षा फीचर्स और तेज डिलीवरी के कारण चीन को प्राथमिकता दी है।

कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती हैं कि चीन की करेंसी प्रिंटिंग लागत अमेरिका और ब्रिटेन के मुकाबले 30-50% कम है। इसका सीधा असर पश्चिमी देशों के करेंसी प्रिंटिंग बाजार पर पड़ रहा है, खासकर ब्रिटेन की मशहूर कंपनी De La Rue पर, जो 140 से ज्यादा देशों के लिए नोट छापती है।

CBPMC दुनिया का सबसे बड़ा करेंसी प्रिंटर, ‘कोलोरडांस’ तकनीक बना आकर्षण

चीन की CBPMC कंपनी 18,000 से ज्यादा कर्मचारियों और 10 सुरक्षित फैसिलिटी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नोट प्रिंटिंग एजेंसी है। इसकी खास पहचान है — कोलोरडांस तकनीक, जो एक एडवांस ऑप्टिकल एंटी-फर्जीकरण फीचर है। इस तकनीक में माइक्रो-नैनो स्ट्रक्चर बनाए जाते हैं, जिनकी वजह से नोट को झुकाते ही 3D जैसा दृश्य दिखाई देता है। इसे कॉपी करना बेहद मुश्किल है, जिससे नकली नोटों को रोकने में मदद मिलती है।

नेपाल ने 2016 में 1000 रुपए के नोट चीन में छपवाकर अमेरिकी कंपनियों की तुलना में 3.76 मिलियन डॉलर की बचत की थी। यही मॉडल अब कई एशियाई देशों को आकर्षित कर रहा है।

भारत की भूमिका सीमित, भूटान अब भी भारत पर निर्भर; पाकिस्तान अपनी प्रेस चलाता है

भूटान अब भी अपनी करेंसी भारत में ही छपवाता है, लेकिन हाल के वर्षों में चीन के साथ सहयोग को लेकर संकेत मिले हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी करेंसी घरेलू प्रेस में छापता है, हालांकि 2018 की कुछ रिपोर्ट्स में चीन से तकनीकी मदद लेने का उल्लेख मिलता है।

भारत की सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन मुख्य रूप से भारतीय रुपए पर फोकस करता है। द डिप्लोमैट की रिपोर्ट (2019) कहती है कि भारत की लागत चीन की तुलना में 20-30% अधिक पड़ती है, जिसके कारण कई देशों ने चीन की ओर रुख कर लिया।

इसके अलावा नासिक और देवास में क्षमता सीमित है तथा नई तकनीक अपनाने में देरी भी एक कारण रही है।

चीन की ‘सॉफ्ट पावर’ रणनीति, विदेशी निर्भरता का जोखिम भी बढ़ा

विशेषज्ञों के अनुसार, करेंसी प्रिंटिंग सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि जियो-पॉलिटिकल सॉफ्ट पावर का भी हिस्सा है। जैसे-जैसे देश अपनी मुद्रा चीन में छपवा रहे हैं, उनकी आर्थिक निर्भरता भी बढ़ रही है। दक्षिण एशिया के 70% विकासशील देश पहले से ही इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में चीन पर निर्भर हैं, और करेंसी प्रिंटिंग इससे एक कदम आगे का संबंध बनाती है।

श्रीलंका इसका बड़ा उदाहरण है, जहां 7 बिलियन डॉलर का कर्ज न चुकाने पर चीन ने 2017 में हम्बनटोटा बंदरगाह को 99 साल के लिए लीज पर ले लिया। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि मुद्रा प्रिंटिंग जैसी संवेदनशील सेवाओं में विदेश निर्भरता से सुरक्षा जोखिम भी बढ़ते हैं।

भारत-नेपाल संबंधों में नोट प्रिंटिंग का प्रभाव, सीमा विवाद के बाद दूरी बढ़ी

नेपाल ने 2020 में नया राजनीतिक मानचित्र जारी कर लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को अपने क्षेत्र में दिखाया था। इसके बाद भारत-नेपाल संबंधों में तनाव बढ़ा और नेपाल ने नोट प्रिंटिंग के लिए चीन पर निर्भरता बढ़ा दी। भारत ने इसे एकतरफा कदम बताया था और तब से दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग में कई बदलाव आए हैं।

नेपाल के केंद्रीय बैंक ने चीन को चुनने की एक वजह यह भी बताई कि भारत की तुलना में चीन की बोली काफी सस्ती थी और डिलीवरी समय भी कम था।

भारत में नोट छपाई की लागत 2025 में बढ़कर 6,372 करोड़ रुपए हुई

भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, देश में हर वर्ष लगभग 1 बिलियन नए नोटों की जरूरत होती है। छोटे नोट (10-20 रुपए) जल्दी खराब होते हैं, इसलिए इनकी छपाई अधिक करनी पड़ती है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2023-24 में नोट छपाई पर 5,101 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि 2024-25 में यह बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपए हो गया।

भारत नासिक, देवास और मैसूर की सरकारी प्रेसों में नोट छापता है, जो सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर हैं, लेकिन लागत चीन की तुलना में अधिक पड़ती है।

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Author: THE CG NEWS

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