
पश्चिम बंगाल में I-PAC से जुड़े छापे के मामले में केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार ने आरोप लगाया कि प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) का इस्तेमाल केंद्र सरकार उन राज्यों में “हथियार” की तरह कर रही है, जहां विपक्ष की सरकारें हैं। इस पर ED ने पलटवार करते हुए कहा कि वह किसी का हथियार नहीं है, बल्कि बंगाल में उसे धमकाया गया।
मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि यह अदालत तय करेगी कि किसका हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और किसे धमकाया गया। कोर्ट ने फिलहाल अगली सुनवाई 18 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी है।
CBI जांच की मांग
ED ने इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (Central Bureau of Investigation) से कराने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। एजेंसी का आरोप है कि 8 जनवरी को कोलकाता में I-PAC के कार्यालयों पर छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और राज्य पुलिस अधिकारियों ने उसकी कार्रवाई में बाधा डाली।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी को टिप्पणी की थी कि यदि किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जांच में बाधा डालता है तो यह गंभीर मुद्दा है। इससे पहले 3 फरवरी को भी मामले की सुनवाई टाल दी गई थी।
2,742 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग का मामला
I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) एक राजनीतिक परामर्श कंपनी है, जो विभिन्न दलों के लिए चुनावी रणनीति तैयार करती है। कंपनी और उसके निदेशक प्रतीक जैन पर कोयला चोरी से जुड़े कथित 2,742 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में संलिप्तता का आरोप है।
CBI ने इस मामले में 27 नवंबर 2020 को प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसके बाद ED ने 28 नवंबर 2020 से मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। आरोप है कि लगभग 20 करोड़ रुपये हवाला के माध्यम से I-PAC तक पहुंचे। इसी सिलसिले में 8 जनवरी 2026 को कोलकाता स्थित कार्यालय और संबंधित ठिकानों पर छापेमारी की गई थी।
छापे के दौरान हुआ विवाद
ED का आरोप है कि छापे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अन्य तृणमूल कांग्रेस नेताओं के साथ I-PAC कार्यालय पहुंचीं और वहां से कुछ फाइलें लेकर बाहर आईं। एजेंसी का यह भी कहना है कि राज्य पुलिस ने उसके अधिकारियों के मोबाइल फोन जब्त किए और कार्रवाई में व्यवधान डाला।
वहीं तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ED की कार्रवाई विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक उद्देश्य से की गई। पार्टी का दावा है कि I-PAC चुनावी रणनीति से जुड़ा संगठन है और छापे का मकसद गोपनीय जानकारी हासिल करना था। राज्य पुलिस ने भी ED अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।
सुप्रीम कोर्ट की पूर्व टिप्पणी
14 फरवरी की सुनवाई में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने कहा था कि राज्य सरकार को ED के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और एजेंसी को अपना काम करने दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक भी लगा दी थी और राज्य सरकार से जवाब मांगा था।
राज्य सरकार ने अपने जवाब में कहा कि यह मामला पहले से कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है और दो संवैधानिक अदालतों में समानांतर कार्यवाही उचित नहीं है।
ED की तीन प्रमुख दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में ED ने कहा कि छापे के दौरान मुख्यमंत्री और राज्य के डीजीपी की मौजूदगी ने जांच को प्रभावित किया। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान व्यवधान हुआ और उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिली।
ED ने अनुच्छेद 21 के तहत अपने अधिकारियों की सुरक्षा और स्वतंत्र जांच के अधिकार की रक्षा की मांग की है। एजेंसी ने कहा कि यदि मामले की जांच CBI को सौंपी जाती है तो इसे राज्य से बाहर स्थानांतरित किया जा सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई 18 मार्च को होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि जांच किस एजेंसी के पास रहेगी और राज्य सरकार के आचरण पर क्या टिप्पणी की जाती है। यह मामला केंद्र–राज्य संबंधों और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
Author: THE CG NEWS
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